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*सखी सैय्यां तो खूब हैं कमात, महंगाई डायन खाए जात है पेट्रोल 102 के पार, डीजल 97 रुपये से ऊपर — जनता की जेब पर फिर पड़ा महंगाई का डाका*

*सखी सैय्यां तो खूब हैं कमात, महंगाई डायन खाए जात है पेट्रोल 102 के पार, डीजल 97 रुपये से ऊपर — जनता की जेब पर फिर पड़ा महंगाई का डाका*

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सखी सैय्यां तो खूब हैं कमात, महंगाई डायन खाए जात है

पेट्रोल 102 के पार, डीजल 97 रुपये से ऊपर — जनता की जेब पर फिर पड़ा महंगाई का डाका

✍️ पत्रकार फरमान हिंदुस्तानी

देश में महंगाई अब सिर्फ आंकड़ों की खबर नहीं रही, बल्कि आम आदमी की रसोई, सफर और जिंदगी पर सीधा हमला बन चुकी है। लगातार चौथी बार डीजल और पेट्रोल के दामों में बढ़ोतरी ने एक बार फिर जनता की कमर तोड़ दी है। पेट्रोल अब 102 रुपये प्रति लीटर के पार पहुंच चुका है, जबकि डीजल भी 97 रुपये प्रति लीटर से ऊपर बिक रहा है।

हर सुबह तेल कंपनियों के नए रेट आम आदमी के लिए किसी बुरी खबर से कम नहीं लगते। मजदूर हो, किसान हो, दुकानदार हो या नौकरीपेशा इंसान — हर किसी की जेब पर महंगाई का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। घर का बजट अब कागजों में नहीं, लोगों की आंखों में टूटता दिखाई दे रहा है।

एक समय था जब पेट्रोल-डीजल के कुछ पैसे बढ़ने पर सड़कों पर प्रदर्शन होते थे, लेकिन आज हालात ऐसे हैं कि जनता चुपचाप महंगाई की मार सहने को मजबूर है। सब्जियों से लेकर दूध, गैस सिलेंडर, बस किराया और रोजमर्रा की हर चीज के दाम आसमान छू रहे हैं।

लोगों के बीच अब वही पुराना गीत फिर गूंजने लगा है —
“सखी सैय्यां तो खूब हैं कमात, महंगाई डायन खाए जात है…”

सरकार विकास और योजनाओं के बड़े-बड़े दावे कर रही है, लेकिन आम आदमी पूछ रहा है कि अगर कमाई का बड़ा हिस्सा सिर्फ पेट्रोल और खाने-पीने में ही खत्म हो जाए तो विकास आखिर किसके लिए है?

किसानों का कहना है कि डीजल महंगा होने से खेती की लागत बढ़ती जा रही है। ट्रैक्टर चलाना, सिंचाई करना और फसल बाजार तक पहुंचाना अब पहले से ज्यादा महंगा हो गया है। वहीं छोटे व्यापारी और वाहन चालक भी परेशान हैं क्योंकि तेल की कीमतें बढ़ने से रोज की कमाई घटती जा रही है।

महंगाई अब सिर्फ आर्थिक मुद्दा नहीं रही, बल्कि यह आम आदमी के धैर्य और उम्मीदों की परीक्षा बनती जा रही है। जनता सवाल पूछ रही है कि आखिर कब रुकेगी यह बढ़ती कीमतों की आग?

फिलहाल हालात यही कहते नजर आ रहे हैं कि
“सखी सैय्यां तो खूब हैं कमात, मगर महंगाई डायन सब खाए जात है…”

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